Mandakini Pachauri (Österreich/Indien) schreibt Lyrik und Prosa in Englisch, Deutsch und Hindi. Sie ist in Indien geboren und lebt am Rand des Wienerwaldes. Zur Zeit thematisiert sie die Widersprüche und Brüche ihrer persönlichen Geschichte und der geopolitischen Regionen in die sie sich bewegt. Ton, Bild, Codes und Sprachen sind Ausdrucksformen Ihrer Bewegungen im Körper, im Geist und im Schreiben.

 

Deutsch

 

 

FÜR DHWANI

 

Frauen lernen Schmerzen früh im Leben.

 

Meine kleine Nichte weigert sich,

zur Schule zu gehen.

 

Sie sagt dass es dort ihr gesagt wird was sie tun soll.

Und das bereitet ihr Kopfweh.

 

Ich schicke sie aus reiner Gewohnheit

raus, im Smog zu spielen.

 

Ich sage, für etwas frische Luft

und weiß nicht, woher ich das habe.

 

Nachts lege ich meinen Kopf

auf ihrer zarten Brustkorb

und spreche im Stillen

ihrem wachsenden Herzen an.

 

Ich sage, nimm nicht den kleinen Schmutz

der Welt an. Widerstehe, Liebste!

 

Du musst mehr sein als das.

Mehr als wir, die diesen Dreck,

diesen Staub mitgebracht haben -

wie sauber sind Worte

wenn sie über der Erde sprechen.

 

Wenn sie also erwacht

und ihr aufstrebendes Wesen

als Ganze auf mich konzentriert,

mich mit ihren Augen bittet,

trete ich ihr Spiel bei

und sie ist mein Geleit.

 

 

 

 

FRAUENKRAUT 

 

 

Die Schönheit einer Frau ist gefährlich

wo ich herkomme, bringt sie Menschen dazu

sie töten zu wollen. 

 

 Als Mädchen ist sie oft verwirrt

vom Leben und wie die Dinge wirklich sind 

 

Sowohl einen Körper als auch einen Geist zu haben

scheint unmöglich zu sein, denkt sie

als sie  den im Spiegel lebenden Rätsel anstarrt

 

 

Sie beginnt ihr Form zu verwandeln

Haut um Haut legt sie ab, enthüllt

neue Frauen, die ihre Kreativität entfesseln 

 

Dann tötet sie eine nach der anderen

sie scheinen überholt, unerträglich zu sein

 

An einigen Tage, wenn sie überleben

sie ist sicher, dass sie ihr Glück gefunden hat

Eines Tages überdrüssig der Gewalt

 

gräbt sie die Körperteile aus

Eine Frau vollkommen zu Hause

im wilden Garten ihres Seins 

 

Übersetzt von der Autorin

 

 

 

 

 

 

HIndi

 

ध्वनि  के  लिए

 

शीघ्र ही महिलाएं 

कष्ट सीखलेती  हैं। 

 

मेरी छोटी भतीजी स्कूल जाने से मना करती है। 

वह  कहती  है  कि वहां उसे बताया जाता है

कि क्या करना है और क्या नहीं।

और  उसे इस से सर में दर्द होता है।

 

आदत  से  मजबूर  मैं  उसे  बाहर  भेजदेती  हूँ, 

धुंध  में  खेलने  के  लिए। 

मैं  कहती  हूं,  कुछ  ताजी  हवा  के  लिए 

और  यह  नहीं  जानती  कि  वह  कहां  से  आती  है।

 

रात  की  खामोशी  में

मैं  उसके  नाजुक  सीने 

पर  अपना  सिर  रख  कर

उसके  बढ़ते  दिल  से  कहती  हूं।

 

दुनिया  की  छोटी-छोटी  गंदगी 

अंदर  उतरने  मत  देना। 

 

प्रतिरोध  करो,  प्रिय! 

तुम्हें  इस  से  बढ़ा  होना  है

हमसे  ज्यादा  जो  इस  मैल, 

इस  धूल  को  लाए  हैं 

-  ये  शब्द  कितने  साफ  हैं

जो  धरती  से  आए  हैं।

 

इसलिए  जब  वह  जागती  है 

और  अपना  पूरा  ध्यान  मुझ  पर  प्रकट  करती  है, 

अपनी  आंखों  से  मुझे  याचना  करती  है, 

मैं  उसके  खेल  में  मिल  जाति  हूं 

और  वह  मेरी  निर्देशिका  बन  जाति  है।

 

 

 

औरत खरपतवार

मेरे देश में औरत की खूबसूरती
खतरनाक होती है इसलिए
लोग उसे मारना चाहते हैं

एक लड़की अक्सर जीवित
होने और वास्तविकता से
भ्रमित रहती है

शरीर और मन दोनों का होना
असंभव लगता है, आईने में रहती पहेली
को देखते हुए वह सोचती है

आकार बदलते हुए वह एक
के बाद एक त्वचा उतारना शुरू कर देती है
नई औरतें उसकी रचनात्मकता खोलती हैं

फिर वह उन्हें एक-एक करके मार देती है
वे पुरानी और असहनीय सी लगती हैं

जिस दिन वे जीवित रहती हैं
उसे यकीन होता है
कि उसने ख़ुशी पा ली है आख़िर
एक दिन वह हिंसा से थक कर

अंशों को खोजके निकालकर
एक संपूर्ण औरत अपने अस्तित्व
के जंगली बगीचे में विराजित होती हैं